इग्नू, क्षेत्रीय केंद्र, लखनऊ ने डॉ. बी. आर. अंबेडकर के जीवन एवं कार्यों पर एक वेबिनार का आयोजन किया

इस अवसर पर वरिष्ठ क्षेत्रीय निदेशक डॉ. अनिल कुमार मिश्रा, क्षेत्रीय निदेशक डॉ. रीना कुमारी, डॉ. अनामिका सिन्हा, डॉ. जय प्रकाश वर्मा, इग्नू, क्षेत्रीय केंद्र, लखनऊ, महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर हरीश कुमार सिंह, समन्वयक डॉ. पर्वत सिंह, सहित विभिन्न अध्ययन केंद्र के समन्वयक एवं इग्नू के शिक्षार्थी उपस्थित रहे।
डॉ. सनोबर हैदर, एसोसिएट प्रोफेसर (इतिहास), राजकीय डिग्री कॉलेज, कुचलाई, सीतापुर वेबिनार की मुख्य वक्ता थीं। वेबिनार का शुभारंभ विश्वविद्यालय के कुलगीत से हुआ।

डॉ. अनिल कुमार मिश्रा ने मुख्य वक्ता, समन्वयकों और सहायक समन्वयकों का स्वागत किया। वेबिनार के समन्वयकों और प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए, डॉ. मिश्रा ने अपने प्रारंभिक संबोधन में आधुनिक भारत के निर्माण में डॉ. भीम राव अंबेडकर के योगदान पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के मुख्य निर्माता बाबासाहेब डॉ. बी. आर. अंबेडकर एक विख्यात विद्वान, दार्शनिक, दूरदर्शी, मुक्तिदाता और सच्चे राष्ट्रवादी थे। उन्होंने समाज के शोषित और वंचित वर्गों के मानवाधिकारों को सुरक्षित करने के लिए कई सामाजिक आंदोलनों का नेतृत्व किया। वे सामाजिक न्याय के संघर्ष के प्रतीक हैं।


मुख्य वक्ता डॉ. सनोबर हैदर ने अपने संबोधन में बताया कि डॉ. अंबेडकर का जन्म महाराष्ट्र राज्य के कोंकण में हुआ था। 1907 में युवा भीमराव ने बॉम्बे विश्वविद्यालय से मैट्रिक परीक्षा उत्कृष्ट अंकों के साथ उत्तीर्ण की। बाद में 1913 में उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। कोलंबिया विश्वविद्यालय ने उन्हें उनके शोध प्रबंध के लिए पीएचडी की उपाधि प्रदान की, जिसे बाद में “ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त का विकास” शीर्षक से पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। उनका पहला प्रकाशित लेख “भारत में जातियाँ – उनकी कार्यप्रणाली, उत्पत्ति और विकास” था। 1920 से 1923 तक लंदन में रहने के दौरान उन्होंने “रुपये की समस्या” शीर्षक से अपना शोध प्रबंध भी पूरा किया, जिसके लिए उन्हें डी.एससी. की उपाधि से सम्मानित किया गया। उन्होंने दलितों के बीच शिक्षा और संस्कृति का प्रसार करने, उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार लाने और उनकी समस्याओं को उचित मंचों पर उठाकर समाधान खोजने के उद्देश्य से 1923 में ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना की। उन्होंने कहा कि दलितों की समस्याएँ सदियों पुरानी और जटिल थीं। मंदिरों में उनका प्रवेश वर्जित था, वे सार्वजनिक कुओं और तालाबों से जल नहीं भर सकते थे, स्कूलों में उनका प्रवेश प्रतिबंधित था। 1927 में उन्होंने चौदर टैंक पर महाद मार्च का नेतृत्व किया। यह जाति-विरोधी और पुरोहित-विरोधी आंदोलन की शुरुआत थी। डॉ. अंबेडकर द्वारा 1930 में नासिक के कालाराम मंदिर में शुरू किया गया ‘मंदिर प्रवेश आंदोलन’ मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के संघर्ष में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है। 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो वे स्वतंत्र भारत के पहले विधि मंत्री बने। संविधान सभा ने संविधान का मसौदा तैयार करने का कार्य एक समिति को सौंपा और डॉ. अंबेडकर को मसौदा समिति का अध्यक्ष चुना गया।

डॉ. अनामिका सिन्हा ने वेबिनार का संचालन किया और मुख्य वक्ता एवं अन्य गणमान्य व्यक्तियों का परिचय भी कराया। डॉ. सिन्हा ने कहा कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर को भारत के संविधान का निर्माता माना जाता है। संविधान के निर्माण और इसे समाज के पिछड़े वर्गों के सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तिकरण का एक सशक्त साधन बनाने में उनका अथक परिश्रम प्रशंसनीय है। उन्होंने लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में उचित नियंत्रण एवं संतुलन सुनिश्चित किया और यह भी सुनिश्चित किया कि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों अंग एक-दूसरे के प्रति जवाबदेह रहते हुए स्वतंत्र रूप से कार्य करें।

महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर हरीश कुमार सिंह ने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि आज हम जिस महापुरुष की बात कर रहे हैं वह दुनिया का एक ऐसा महापुरुष है जिसने विपरीत परिस्थितियों को चुनौती के रूप में स्वीकार कर निर्भीकता के साथ समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर कर समता मूलक समाज की स्थापना के लिए अपना संपूर्ण जीवन लगा दिया। साथ ही संवैधानिक रास्ते से एक क्षमता मूलक राष्ट्र निर्माण की ठोस आधारशिला भी राखी।

अंत में डॉ. पर्वत सिंह ने औपचारिक धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इसी के साथ नारी शक्ति बंधन अधिनियम 2023 की समाज में जन जागरूकता लाने के उद्देश्य से इग्नू क्षेत्र के लखनऊ द्वारा पोस्टर प्रतियोगिता का आयोजन किया गया तथा प्रतिभागी विजय विद्यार्थियों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।


