भारतीय ज्ञान परंपरा पर वर्चुअल सेमिनार : वर्तमान में प्रेरणा स्रोत

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पुखरायां कानपुर देहात कस्बा के रामस्वरूप ग्राम उद्योग परास्नातक महाविद्यालय में संचालित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय(इग्नू) अध्ययन केंद्र समन्वयक डॉ पर्वत सिंह ने बताया कि इग्नू क्षेत्रीय केंद्र, लखनऊ ने राष्ट्रीय शिक्षा दिवस मनाने के लिए गूगल मीट के माध्यम से “भारतीय ज्ञान परंपरा: वर्तमान में प्रेरणा स्रोत” विषय पर वर्चुअल सेमिनार का आयोजन किया है।

वर्चुअल सेमिनार में वरिष्ठ क्षेत्रीय निदेशक डॉ अनिल कुमार मिश्रा, उप निदेशक डॉ. रीना कुमारी, डॉ. अनामिका सिन्हा और डॉ. जय प्रकाश वर्मा, महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ हरीश कुमार सिंह, समन्वयक डॉ. पर्वत सिंह, डॉ. एस.पी. डॉ. अरुण कुमार सिंह, डॉ. आरपी सिंह, डॉ. वंदना श्रीवास्तव सहित 125 छात्र-छात्राएं उपस्थित रही। लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ के प्राचीन भारतीय इतिहास और पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर और पूर्व-अध्यक्ष प्रो. शैलेंद्र नाथ कपूर वर्चुअल सेमिनार के मुख्य वक्ता थे। संगोष्ठी की शुरुआत विश्वविद्यालय के कुलगीत की प्रस्तुति के साथ की गई।

वरिष्ठ क्षेत्रीय निदेशक डॉ अनिल कुमार मिश्रा ने स्वागत भाषण दिया और प्रतिभागियों के साथ मुख्य वक्ता का परिचय कराया। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा दिवस मनाने के उद्देश्य के बारे में चर्चा की और स्वतंत्रता के बाद भारतीय शिक्षा प्रणाली को आकार देने में मौलाना अबुल कलाम आजाद के योगदान पर जोर दिया।

प्रो. शैलेंद्र नाथ कपूर ने स्वतंत्रता से पहले और बाद में शिक्षा प्रणाली में मौलाना अबुल कलाम आजाद के योगदान का वर्णन किया है। उन्होंने प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली के बारे में चर्चा की। वेदों, ऋचाओं की वर्तमान परिदृश्य में प्रासंगिकता के बारे में बताया। उन्होंने उपनिषदों, अभिज्ञान शाकुंतलम, अष्टाध्यायी के बारे में भी चर्चा की और बताया कि कैसे इन प्राचीन ग्रंथों में उल्लिखित शब्द आज भी हमारी शब्दावली का हिस्सा हैं। उन्होंने यह भी बताया कि ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी भी भारतीय साहित्य से प्रभावित थे और उन्होंने भगवद गीता का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद भी किया।

डॉ हरीश कुमार सिंह ने अपने उद्बोधन में गुरुकुल प्रणाली को याद करते हुए शिक्षा में संवाद अनुशासन और चरित्र निर्माण युगानुकुल मान्यताओं में परिवर्तन की भी बात की।

डॉ अनामिका सिन्हा ने वेबिनार का सफलतापूर्वक संचालन करते हुए कहा कि संस्कृति को सहेजने वाले ही शिखर पर पहुंचते हैं क्योंकि संस्कृति हमें बीते हुए कल से वर्तमान तक जोड़े रखती है। अंत में डॉ पर्वत सिंह ने औपचारिक धन्यवाद ज्ञापित करते हुए गुरु शिष्य परंपरा में राम एवं विश्वामित्र, संदीपन एवं श्री कृष्णा कोई याद करते हुए प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं परंपरा को आत्मसात करने की बात की।

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